
Saturday, March 31, 2007
Ok! so here's more
powered by performancing firefox
yu hu ... hu hu hu
my search wasn't in vain after all. i gt performancing for seamonkey. thats so cool. and its working. this post is from performancing. its awesome man -- no firefox now. seamonkey rules.
u can also get it here - http://users.skynet.be/fa258499/hackedexts.html#performancing
powered by performancing firefox
xpde
it is a desktp manager claimed to be very close to xp. it is indeed except that it refuses to run any of the launch icons. the xp gui has been totally copied along with start menu etc.. but of no use. cudnt start my computer or notepad or any of my previous installed apps through their destop launchers. wtf!
just too too bad! they only get the points for the presetation - take a look at their screenshots .. and faq - see the questions - trying to become studs!
now what..
came across a good one - jajuka! sounds more like an arabic geanie. neways its a java based app with good features and gui. the only problem - is a bit resourceful like other java apps (viz. azureus). but it surely is worth giving a try.
tried many others but nothing intriguing enough to write about.
Next: exaile
the latest version(0.2.9) seems to be somewhat buggy. it doesnt show the wiki infos and lyrics. waiting for a bugfix release.
Seamonkey
after this i don't have to turn back to firefox. the only thing which i miss is performancing (the ultimate blog tool) - and thats one of the main reasons of my being inactive on my blogs ;).
may god bless me by making those developers port it for seamonkey!
amen.
Thursday, March 08, 2007
something that turns me on! really?
आराम सुधा की एक बूंद, तन का दुबलापन खोती है।
आराम शब्द में ‘राम’ छिपा जो भव-बंधन को खोता है।
आराम शब्द का ज्ञाता तो विरला ही योगी होता है।
इसलिए तुम्हें समझाता हूँ, मेरे अनुभव से काम करो।
ये जीवन, यौवन क्षणभंगुर, आराम करो, आराम करो।
यदि करना ही कुछ पड़ जाए तो अधिक न तुम उत्पात करो।
अपने घर में बैठे-बैठे बस लंबी-लंबी बात करो।
करने-धरने में क्या रक्खा जो रक्खा बात बनाने में।
जो ओठ हिलाने में रस है, वह कभी न हाथ हिलाने में।
तुम मुझसे पूछो बतलाऊँ — है मज़ा मूर्ख कहलाने में।
जीवन-जागृति में क्या रक्खा जो रक्खा है सो जाने में।
मैं यही सोचकर पास अक्ल के, कम ही जाया करता हूँ।
जो बुद्धिमान जन होते हैं, उनसे कतराया करता हूँ।
दीए जलने के पहले ही घर में आ जाया करता हूँ।
जो मिलता है, खा लेता हूँ, चुपके सो जाया करता हूँ।
मेरी गीता में लिखा हुआ — सच्चे योगी जो होते हैं,
वे कम-से-कम बारह घंटे तो बेफ़िक्री से सोते हैं।
- गोपालप्रसाद व्यास
Wednesday, March 07, 2007
I am active again - read daily comic strips online.
1. http://home.iitk.ac.in/~sudhansh/comics.php
2. http://home.iitk.ac.in/~sudhansh/comics
Both are good enough for me. But or you the first one has slight customizable properties. As you can see it contains strips with numbers allotted to them (written on the left side). So if you wish to watch only a few ones among them just give those no. ids as inputs (comma separated) to the page. For eg. ......comics.php?id=1,2,7,9,15
You can also add the width element (width of the images). Default is 900.
eg. ....comics.php?id=1,2,7,9,15&width=1000
The second script is something I am currently working on. It is basically an open source project "dailyscripts" by 'I don't remember who', but I am trying to add better user custamization options to it. Currently it gets refreshed daily at 1.00 am (IST) (I might change the time depending on the availability of the comics). Thats all for now,
Enjoy!!
Wednesday, February 07, 2007
Dan Osman - Free Soloing
Mountain Climber - video powered by Metacafe
Free Soloing is the art of climbing up a rock without any ropes etc.Dan Osman was an expert in this. Watch him climb this mountain almost like spider man. He died trying "controlled free falling" at the age of 35.
Tuesday, January 23, 2007
हिंदी लिखने के तरीके
इस समय मैं जो तरीका अपना रहा हूं वो है बरहा साफ़्ट्वेयर - (I love this method) http://www.baraha.com/BarahaIME.htm
डाउनलोड कीजिए - कीबोर्ड शार्टकट प्रेस कीजिए ऒर शुरु हो जाइए . जहां मन करे हिंदी में टाइप कीजिए.
दूसरा तरीका - http://kaulonline.com/uninagari/
तीसरा तरीका -
शुशा फ़ान्ट (http://www.abhivyakti-hindi.org/abhi/hindi_shusha_fonts_dl_help.htm)
उठाइए और लिखना शुरु कीजिए. http://manaskriti.com/su/ से कन्वर्टर उठाइए और अपने शुशा
टेक्स्ट को कन्वर्ट कर लीजिए युनिकोड में.
हम सब नौटंकी करते हैं
जीवन सारा इक नाटक है , हम सबने इसको माना है ।।
सभी यहाँ जीवन-नाटक के पात्र निभाया करते हैं ,
लेकिन देखो हम कैसे हर नाटक में जीवन भरते हैं ,
नाटक से जीवन में कैसे हम हलचल लाया करते हैं ।
हम सब नौटंकी करते हैं ।।
विश्वास आस में भर-भर के ,
उल्लास से प्यास बुझाकर के ,
परिहास-हास से मिल-जुलकर ,
अनवरत प्रयास लगाकर के ,
उच्छ्वास समाज का हरते हैं ।
कभी चीख-चीख कर राहों में ,
या फिर परदों की छाँवों में ,
हम आँखें डाल निगाहों में ,
हर दिल पे दस्तक देते हैं ।
हम यूँ नौटंकी करते हैं ।।
जब रात LHC के नीचे अपनी आवाज खनकती है ,
हम सबके जोश की गर्मी से सर्दी भी पिघला करती है ,
चंदा-तारे चेहरे के भावों से कुंठित हो जाते हैं ,
तो भोर में हम कोशिश करके अपनी script बनाते हैं ।
तालियों के शोर जब हर ओर गूँजा करते हैं ,
सारी थकान को छोड , भाव-विभोर होकर ,
इक नए उत्साह में सराबोर होकर ,
हम फिर से नौटंकी करते हैं ।।
तलवार कलम की धार नहीं ,
केवल आवाज की धार सही ,
ललकारो तो हुँकार सही ,
मुस्काओ तो है प्यार सही ।
पर अदा वही जो श्रोता के
दिल पर कर जाए वार सही ।
जब आन पड़े तो हम देखो कविता से आहट करते हैं ,
हम तो नौटंकी करते हैं ।।
मधुर स्मृतियाँ
मधुर स्मृतियाँ ,
आह ! वो मधुर स्मृतियाँ
जो कभी मेरे जीवन की
मृदुल सच्चाइयाँ थीं ,
आज कुछ बिखरे हुए पन्नों में सिमटी हुई ,
चन्द तस्वीरों के आवरण में
अपने सूक्ष्म रूप को छिपाती-दिखाती
मेरे मन में आज फिर इक हूक सी जगाती हैं ,
मेरे दिल को उदास कर जाती हैं |
मेरा दिल जो अब तक प्रसन्नता का आवरण ओढ़े हुए ,
भावपूणर् दोस्तों के बीच ,
मौजों के , मस्तियों के नीचे ,
यादों की आहों को दबाए हुए था ,
आज अचानक
तनहाइयों में सिसक पड़ा ;
एक गुबार सा उठा
जिसने मेरे मन-मस्तिष्क को
झकझोर कर रख दिया और
मैं फिर से उन स्वप्निल क्षणों को
जीने के लिए
बेताब हो उठा |
सच मानिए मेरी दिली तमन्ना है
कि मैं फिर से उन बीती यादों को ,
बचपन के , स्कूल के उन क्षणों को
उस मार को ,
दीदी के साथ की गई तकरार को ,
मम्मी-पापा के उस अनूठे प्यार को
साकार कर सकूँ |
पर मुझे मालूम है कि समय कभी वापस नही लौटता |
मैं भी उन यादों को फिर से जी नहीं सकता ,
पर हाँ ,
मैं उनके सहारे , कुछ ही पलों के लिए सही ,
एक नए जीवन ,
एक नई दुनिया में पदापर्ण कर सकता हूँ |
इसीलिए ,
उन मधुर स्मृतियों में खोए हुए इस मन
से निकलती आवाज को
मैं अपनी लेखनी से एक यादगार रूप दे रहा हूँ |
उम्मीद है , वे आँखें
जो आज अचानक ही बोझिल हो उठीं थीं ,
आज एक नया स्वप्न देखेंगी
और एक नई आशा के साथ
मेरे सुनहरे लक्ष्य को पूरा करने के लिए
मेरी हर संभव सहायता करेंगी ,
ताकि फिर कभी अगर ऐसे क्षणों का आगमन हो
तो मैं मुस्कुरा सकूँ कि
इन्ही कठिन परिस्थतियों के कारण आज मैं
यहाँ पर खड़ा हूँ ,
और खोया हूँ एक बार फिर
उन्ही मधुर स्मृतियों में !!
ये क्या है !
नहीं छुपा है कोई राज़ ,
हो गया देखो पर्दाफाश ,
रौशन है सारा आकाश .
घड़ी की सुईयां टिक टिक टिक ,
हो गयी हैं कितनी निर्भीक् ,
सब हैं सपनों में खोए ,
घड़ियां फिर भी ना सोएं .
टिटि टी टिंग ,
टिटि टी टिंग ,
टिटि टी टिंग ,
टिटि टी टिंग !
सात बज़े बज़ गया अलार्म ,
नीन्द को क्यों कर दिया हराम ,
क्या होगा इसका अंज़ाम,धड़ाम ,
हो गया काम तमाम .
नीन्द अचानक जब ये टूटी ,'
आठ बज गए चीखें छूटीं ,
पैर में मोजे, मुँह में ब्रश है ,
बाथरूम में हो गई रश है ,
चेहरा धोके बैग सम्भाला ,
चार ब्रेडों को मुँह में डाला .
पिछ्ला सब कुछ भूल चले हैं ,
साईकिल के पीछे झूल चले हैं ,
पहले केवल दस थे बच्चे ,
बाकी सब तो लेट हैं पहुंचे ,
प्रॉफ को लगता रोज है झटका ,
इनके बीच ही क्यों मुझे पटका .
पिछला लेक्चर किया नहीं था ,
टाइम कुछ भी दिया नहीं था ,
आज का कुछ भी समझ न आए ,
लेक्चर यारों हमें रुलाए ,
आखिरी मिनट में आई जम्हाई ,
मिली खुशी, है राहत पाई .
फिज़िक्स पढ़ेंगे दौड़े भागे ,
दोस्तों की भी सीटें टांगे ,
( किसी और को दोष दें काहें ,
कुर्सी मोह तो सब में समाए . )
सोचा है अब ध्यान लगेगा ,
भेजे में अब कुछ तो घुसेगा ,
इंस्ट्र्क्टर बोले समझाये ,
नीन्द से हमको कौन बचाए ,
पलकें भारी - झट से झपकीं ,
कंधे झूले , गर्दन टपकी .
घंटी बजी तो हम भरपाए ,
मैथ्स से हमको कोई बचाए ,
मदद की कोई आस नहीं है ,
सब्र हमारे पास नहीं है .
हम तो देखो रूम पे आए ,
हफ्तों हो गए हमे नहाए ,
शेव करें , खुद को चमकाएं ,
आराम ज़रा फिर हम फरमाएं .
प्रॉफ हमारे दुश्मन हैं ,
अटेंडेंस का क़्वेश्चन है ,
डी 0 में ज़ाना पड़ेगा ,
दौड़ के फिर हमें आना पड़ेगा .
आया देखा ट्रैफिक जाम ,
मेस का खाना हुआ हराम ,
शर्ट पे अपनी दाल उड़ेली ,
नमक था लेना, चीनी लेली .
अरे अभी तो लैब है अपनी ,
फ्रॉड की हमको माला ज़पनी ,
वाइवा में ज़ब भी हम हारें ,
टी ए को तब मस्का मारें .
लैब से आ गए अब हम यारों ,
हो गए खाने चित हम चारों ,
आठ बज़े तक मरे रहे हम ,
उठे तो देखो भूल गए गम .
अब तो देखो धूम मची है ,
हमने दुनिया नयी रची है ,
टी वी , डब्बे संग हमारे ,
गाने भी हैं कुछ को प्यारे .
कहीं पे बुल्ला कटता है ,
कहीं पे हल्ला मचता है ,
बॉट में हुआ बवाल है ,
क्रिकेट नहीं तो फुटबाल है .
चारों तरफ ही मस्ती है ,
सारी जनता फंसती है ,
अब तो कोई रोक नहीं ,
तीन बज़ गए टोक नहीं ,
कौवे बोले भोर हो गई ,
सारी ज़नता अब तो सो गई .
घड़ियां फिर चलने लगती हैं ,
सात पे सूँई फिर दिखती है .
नीन्द को हमने धूल चटाई ,
फिर भी,बकुल कहैं लव कर लो भाई !