at s7dhansh.wordpress.com
I didn't want to say much but the blogger is hell bent to prove my decision correct :). If you wonder why I am so hell bent on emphasizing my shift, its becuase everytime I posted, I got a bx-pier something error, which led me to believe that it didn't get posted. Anyways, thanks blogger ;P.
Saturday, October 11, 2008
Continued.....
at http://s7dhansh.wordpress.com
Since the new release of wordpress (probably 2.5 onwards), I have completely made a switch to wordpress owing to their better features and flexibility options. Sounds too superficial, but as usual, I don't like to talk much. If you want the details create an account there.
See you at http://s7dhansh.wordpress.com .
Saturday, March 22, 2008
वतन बेचते हैं
अमन चोरों को देखो अमन बेचते हैं
कफ़न चोरों को देखो कफ़न बेचते हैं
रखवाला जिसे बनाया देश का
वो दिल्ली में बैठे वतन बेचते हैं
–
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कफ़न चोरों को देखो कफ़न बेचते हैं
रखवाला जिसे बनाया देश का
वो दिल्ली में बैठे वतन बेचते हैं
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जब नाव जल में छोड़ दी
जब नाव जल में छोड़ दी
तूफान ही में मोड़ दी
दे दी चुनौती सिंधु को
फिर धार क्या मझधार क्या
–
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तूफान ही में मोड़ दी
दे दी चुनौती सिंधु को
फिर धार क्या मझधार क्या
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हिंद की विशेषता
एक राह के हैं मीत, मीत एक प्यार के
एक बाग के हैं फूल, फूल एक हार के
देखती है यह जमीन, आसमान देखता
अनेकता में एकता, ये हिंद की विशेषता.
–
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एक बाग के हैं फूल, फूल एक हार के
देखती है यह जमीन, आसमान देखता
अनेकता में एकता, ये हिंद की विशेषता.
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फूल
अजी शिखर पर जो चढ़ना है तो कुछ संकट झेलो
चुभने दो-चार कांटें, फिर जी भर गुलाब से खेलो.
–
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जिसने मरना सीख लिया है जीने का अधिकार उसी को
जो काँटों के पथ पर आया फूलों का उपहार उसी को.
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वक्त को जिसने ना समझा उसे मिटना पड़ा है
बच गया तलवार से तो फूल से कटना पड़ा है.
–
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Friday, December 14, 2007
न किसी की आँख का नूर
न किसी की आँख का नूर हूँ न किसी के दिल का क़रार हूँ
जो किसी के काम न आ सके मैं वो एक मुश्त-ए-ग़ुबार हूँ
न तो मैं किसी का हबीब हूँ न तो मैं किसी का रक़ीब हूँ
जो बिगड़ गया वो नसीब हूँ जो उजड़ गया वो दयार हूँ
मेरा रन्ग-रूप बिगड़ गया मेरा यार मुझ से बिछड़ गया
जो चमन फ़िज़ाँ में उजड़ गया मैं उसी की फ़स्ल-ए-बहार हूँ
पये फ़ातेहा कोई आये क्यूँ कोई चार फूल चड़ाये क्यूँ
कोई आके शम्मा जलाये क्यूँ मैं वो बेकसी का मज़ार हूँ
मैं नहीं हूँ नग़मा-ए-जाँफ़िशाँ मुझे सुन के कोई करेगा क्या
मैं बड़े बरोग की हूँ सदा मैन बड़े दुख की पुकार हूँ
--
बहादुर शाह जफ़र
(the moghul emperor)
जो किसी के काम न आ सके मैं वो एक मुश्त-ए-ग़ुबार हूँ
न तो मैं किसी का हबीब हूँ न तो मैं किसी का रक़ीब हूँ
जो बिगड़ गया वो नसीब हूँ जो उजड़ गया वो दयार हूँ
मेरा रन्ग-रूप बिगड़ गया मेरा यार मुझ से बिछड़ गया
जो चमन फ़िज़ाँ में उजड़ गया मैं उसी की फ़स्ल-ए-बहार हूँ
पये फ़ातेहा कोई आये क्यूँ कोई चार फूल चड़ाये क्यूँ
कोई आके शम्मा जलाये क्यूँ मैं वो बेकसी का मज़ार हूँ
मैं नहीं हूँ नग़मा-ए-जाँफ़िशाँ मुझे सुन के कोई करेगा क्या
मैं बड़े बरोग की हूँ सदा मैन बड़े दुख की पुकार हूँ
--
बहादुर शाह जफ़र
(the moghul emperor)
एक अक्स है कि काँप रहा है शराब में
कब से हैं एक हर्फ़ पे नज़रें जमीं हुईं
वो पढ़ रहा हूँ जो नहीं लिक्खा किताब में
[हर्फ़ = a letter of the alphabet]
पानी नहीं कि अपने ही चेहरे को देख लूँ
मन्ज़र ज़मीं के ढूँढता हूँ माहताब में
[मन्ज़र = scene/view; माहताब = Moon]
कब तक रहेगा रूह पे पैराहन-ए-बदन
कब तक हवा असीर रहेगी हुबाब में
[रूह =soul; पैराहन-ए-बदन = dresslike body]
[असीर = imprisoned; हुबाब = bubble]
जीने के साथ मौत का डर है लगा हुआ
ख़ुश्की दिखाई दी है समन्दर को ख़्वाब में
[ख़ुश्की = dryness]
एक याद है कि छीन रही है लबों से जाम
एक अक्स है कि काँप रहा है शराब में
--
शाकेब ज़लाली
वो पढ़ रहा हूँ जो नहीं लिक्खा किताब में
[हर्फ़ = a letter of the alphabet]
पानी नहीं कि अपने ही चेहरे को देख लूँ
मन्ज़र ज़मीं के ढूँढता हूँ माहताब में
[मन्ज़र = scene/view; माहताब = Moon]
कब तक रहेगा रूह पे पैराहन-ए-बदन
कब तक हवा असीर रहेगी हुबाब में
[रूह =soul; पैराहन-ए-बदन = dresslike body]
[असीर = imprisoned; हुबाब = bubble]
जीने के साथ मौत का डर है लगा हुआ
ख़ुश्की दिखाई दी है समन्दर को ख़्वाब में
[ख़ुश्की = dryness]
एक याद है कि छीन रही है लबों से जाम
एक अक्स है कि काँप रहा है शराब में
--
शाकेब ज़लाली
भूल गया
नगरी नगरी फिरा मुसाफ़िर घर का रस्ता भूल गया
क्या है तेरा क्या है मेरा अपना पराया भूल गया
अपनी बीती जग बीती है जब से दिल ने जान लिया
हँसते हँसते जीवन बीता रोना धोना भूल गया
अँधिआरे से एक किरन ने झाँक के देखा, शर्माई
धुँध सी छब तो याद रही कैसा था चेहरा भूल गया
हँसी हँसी में खेल खेल में बात की बात में रंग गया
दिल भी होते होते आख़िर घाव का रिसना भूल गया
एक नज़र की एक ही पल की बात है डोरी साँसों की
एक नज़र का नूर मिटा जब एक पल बीता भूल गया
जिस को देखो उस के दिल में शिकवा है तो इतना है
हमें तो सब कुछ याद रहा पर हम को ज़माना भूल गया
कोई कहे ये किस ने कहा था कह दो जो कुछ जी में है
"मीराजी" कह कर पछताया और फिर कहना भूल गया
--
मीराजी
क्या है तेरा क्या है मेरा अपना पराया भूल गया
अपनी बीती जग बीती है जब से दिल ने जान लिया
हँसते हँसते जीवन बीता रोना धोना भूल गया
अँधिआरे से एक किरन ने झाँक के देखा, शर्माई
धुँध सी छब तो याद रही कैसा था चेहरा भूल गया
हँसी हँसी में खेल खेल में बात की बात में रंग गया
दिल भी होते होते आख़िर घाव का रिसना भूल गया
एक नज़र की एक ही पल की बात है डोरी साँसों की
एक नज़र का नूर मिटा जब एक पल बीता भूल गया
जिस को देखो उस के दिल में शिकवा है तो इतना है
हमें तो सब कुछ याद रहा पर हम को ज़माना भूल गया
कोई कहे ये किस ने कहा था कह दो जो कुछ जी में है
"मीराजी" कह कर पछताया और फिर कहना भूल गया
--
मीराजी
Wednesday, November 07, 2007
किधर जाना - मख्मूर
बिखरते टूटते लम्हों को अपना हमसफ़र जाना
था इस राह में आख़िर हमें ख़ुद भी बिखर जाना
हवा के दोश पर बादल के टुकड़े की तरह हम हैं
किसी झोंके से पूछेंगे कि है हम को किधर जाना
[दोश=shoulder]
मेरे जलते हुए घर की निशानी बस यही होगी
जहाँ इस शहर में रौशनी देखो ठहर जाना
पस-ए-ज़ुल्मत कोई सूरज हमारा मुन्तज़िर होगा
इसी एक वहम को हम ने चिराग़-ए-रहगुज़र जाना
[पस-ए-ज़ुल्मत=beyond the darkness; मुन्तज़िर=waiting]
दयार-ए-ख़ामशी से कोई रह-रह कर बुलाता है
हमें "मख्मूर" एक दिन है इसी आवाज़ पर जाना
[दयार-ए-ख़ामशी=house of death]
-- "मख्मूर"
था इस राह में आख़िर हमें ख़ुद भी बिखर जाना
हवा के दोश पर बादल के टुकड़े की तरह हम हैं
किसी झोंके से पूछेंगे कि है हम को किधर जाना
[दोश=shoulder]
मेरे जलते हुए घर की निशानी बस यही होगी
जहाँ इस शहर में रौशनी देखो ठहर जाना
पस-ए-ज़ुल्मत कोई सूरज हमारा मुन्तज़िर होगा
इसी एक वहम को हम ने चिराग़-ए-रहगुज़र जाना
[पस-ए-ज़ुल्मत=beyond the darkness; मुन्तज़िर=waiting]
दयार-ए-ख़ामशी से कोई रह-रह कर बुलाता है
हमें "मख्मूर" एक दिन है इसी आवाज़ पर जाना
[दयार-ए-ख़ामशी=house of death]
-- "मख्मूर"
Tuesday, October 16, 2007
use geany..
if u don't use already. lightest ide ever!
if u don't want an ide .. use scite - best programming editor.
if u don't want an ide .. use scite - best programming editor.
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